कुछ हक़ीक़त है कुछ फसाना है
ज़िंदगी ख़्वाब का ख़ज़ाना है।
आँख गिरवी है नींद है गिरवी
पर ज़माने को क्या दिखाना है।
लाख ग़म हैं पता किसे है नहीं
फिर भी हर हाल मुस्कुराना हैं।
अपनी क़िस्मत पे गर्व कर लीजे
यूँ ख़िलाफत में तो ज़माना है।
सब रुलाएँगे ऐ!अनिल तुझको
खुद को खुद से यहाँ हँसाना है।
-पंडित अनिल
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