घुटते जाएँगे
हम विराने में ही घुटते जाएँगे
राम जाने किस किनारे जाएँगे।
सामने जो है नहीं उनकी ख़बर
बाद मरने के वो ढूँढे जाएँगे।
सुब्ह उग के शाम को सूरज ढला
खुद को ढलते हम भी देखे जाएँगे।
ज़ुर्म की आँधी चली है हर तरफ़
देखिएगा दूर उड़ के जाएँगे।
अनसुने रह जाएँगे बेशक़ अनिल
दिल की हम फिर भी सुनाते जाएँगे।
-पंडित अनिल
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