नफ़ा देख कर दोस्ती कर रहे हैं
वो अब इस तरह आशिक़ी कर रहे हैं।
जो रिश्ते पुराने हुए अब न उनसे
कभी भूल कर बात भी कर रहे हैं।
घराना बड़ा है बड़ा नाम उनका
हैं बूढ़े मगर दिल्लगी कर रहे हैं।
ज़ुबाँ में शहद है मगर दिल है शातिर
शराफ़त हैं ओढ़े ठगी कर रहे हैं।
बड़े तर्क से झूठ कहते हैं साहब
हरिक बात अपनी बड़ी कर रहे हैं।
-पंडित अनिल
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