चुनौतियाँ आती हैं,आएँगी, उनसे क्या घबराना,
राह में काँटे मिलें तो,हौसलों का फूल खिलाना।
आँधियाँ कितनी भी उठकर, राह अपनी रोक लें,
दीप बनकर तम में जलना,हार को मत पास लाना।
पर्वतों के पार भी तो,एक नव संसार है,
धैर्य जिसके साथ चलता,जीत का आधार है।
ठोकरों से सीख लेकर,जो सँभलकर चल पड़ा,
उसके आगे एक दिन,झुकता स्वयं दुर्वार है।
वक्त की हर चोट में भी,एक शिक्षा छिपी हुई,
रात की चादर तले,नव भोर है सिमटी हुई।
जो कठिन पथ पर निरंतर,कर्म के रथ पर चले,
उसकी श्रम-साधना से ही,मंज़िलें हैं जुड़ी हुई।
हार को अंतिम समझना,कायरों का काम है,
गिर के उठना ही मनुज के,साहसों का नाम है।
लक्ष्य पर दृढ़ दृष्टि रखकर,कर्म करते जाइए,
जीत उसके पग चूमती,जिसका अटल विश्वास है।
-पंडित अनिल
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