चाक दिल
चाक दिल इस तरह सिया मैंने
ज़ह्र हँस-हँस के है पिया मैंने।
ढल रही उम्र दिल सुक़ूँ माँगे
कुछ अलग फैसला लिया मैंने।
अपनी जानिब समझ-समझ के उसे
ज़िदगी भर वफ़ा किया मैंने
जिस परिंदे में जान अटकी थी
वो परिंदा उड़ा दिया मैंने।
अश्क़ आखिर दिखा के क्या करता
आँख में ही छिपा लिया मैंने।
-पंडित अनिल
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