हँसने खिलखिलाने के दिन रोज़ क्यों नहीं आते हैं,
कन्याओं को मनाने के दिन रोज़ क्यों नहीं आते हैं,
क्या अष्टमी–नवमी को ही इन्हें न्योता देना है,
फिर अष्टमी–नवमी रोज़ क्यों नहीं आते हैं।
मुस्कुराती, दौड़ती, चहकती एक घर से दूसरे घर को जाती,
घर घर में पूजा और दुलार बहुत सारा पाती,
खाने के लिए कई व्यंजन मिलते साथ में बहुत सी खुशियाँ,
क्या अष्टमी–नवमी को ही यह इन्तजार रहेगा,
नहीं तो फिर अष्टमी–नवमी रोज़ क्यों नहीं आती।
क्यों इन मासूमों पर अत्याचार होता है,
क्यों इन्हें कूड़े करकट बीनने सड़कों पर छोड़ा होता है,
क्यों इन्हें बच्चों सा जीने नहीं दिया जाता है,
ढकोसला दिखाने साल में दो ही दिन क्यों आते हैं?
नहीं तो फिर अष्टमी–नवमी रोज़ क्यों नहीं आते हैं।
बिना धुला मुँह भी आज कैसे चमक रहा है,
मारे खुशियों के सड़कों पर त्योहार बना हुआ है,
हर घर में इंतजार में उनके आस बिछाए बैठे हैं,
कब आएंगी देवी स्वरूप कन्याएं स्वागत को बैठे हैं,
ये आडम्बर हम दो ही दिन क्यों करते हैं,
नहीं तो फिर अष्टमी–नवमी हम रोज़ क्यों नहीं करते हैं।
मासूमों का मुस्कुराना क्यों नहीं अच्छा लगता है,
इनको गले लगाना क्यों अच्छा नहीं लगता है,
साल के और दिनों इन्हें पास बुलाना क्यों अच्छा नहीं लगता है,
क्या और दिनों माता कहीं और चली जाती है,
नहीं तो फिर अष्टमी–नवमी रोज़ क्यों नहीं आती है।
इन दो दिनों ऐसा लगता है जैसे धरा बदल चुकी है,
सबके मन में माँ की ममता जाग चुकी है,
ऐसा सुन्दर जगत बना है इक सपना सा लगता है,
ऐसा सुन्दर पावन जीवन हर पल क्यों नहीं रहता है,
दो ही दिन में हर जीवन से क्या पावनता चली जाती है,
नहीं तो फिर अष्टमी–नवमी रोज़ क्यों नहीं आती है।
— अनिल कुमार ध्यानी
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