आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अँखिया पथराई

                
                                                         
                            *काया कुम्हलाई*
                                                                 
                            

सगुन मनाते जिह्वा छिल गई
काया कुम्हलाई।
साजन दरस न दीन्हों अब तक
अँखिया पथराई।।

नस नस बाधित होन लगी है,
रंध्र रंध्र कर रही ठगी है।
कुंठित बुद्धि हुई पग हारे,
पथ माया भरमाई।
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई,
काया कुम्हलाई।।

कोमल मुख है म्लान हुआ अब,
अस्थि पंजर ग्लान हुआ अब।
त्वचा लटकती साँस गटकती,
चल वेला आई।
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई,
काया कुम्हलाई।।

नाम लगन से साजन रीझे,
अंग-अंग अमृत रस भीजे।
दुनियादारी बड़ी बिमारी,
सजनी घबराई।
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई,
काया कुम्हलाई।।
-पंडित अनिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर