*काया कुम्हलाई*
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई
काया कुम्हलाई।
साजन दरस न दीन्हों अब तक
अँखिया पथराई।।
नस नस बाधित होन लगी है,
रंध्र रंध्र कर रही ठगी है।
कुंठित बुद्धि हुई पग हारे,
पथ माया भरमाई।
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई,
काया कुम्हलाई।।
कोमल मुख है म्लान हुआ अब,
अस्थि पंजर ग्लान हुआ अब।
त्वचा लटकती साँस गटकती,
चल वेला आई।
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई,
काया कुम्हलाई।।
नाम लगन से साजन रीझे,
अंग-अंग अमृत रस भीजे।
दुनियादारी बड़ी बिमारी,
सजनी घबराई।
सगुन मनाते जिह्वा छिल गई,
काया कुम्हलाई।।
-पंडित अनिल
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