आते नहीं हैं दोस्त
गुज़रे हुए दिन लौट के आते नहीं हैं दोस्त,
कुछ ज़ख़्म मगर दिल से मिटाते नहीं हैं दोस्त।
जो लोग कभी साथ में चलते थे हमारे,
अब राह में वो हमको बुलाते नहीं हैं दोस्त।
बीते हुए मौसम की महक याद है दिल में,
वो फूल मगर फिर से खिलाते नहीं हैं दोस्त।
कुछ ख़्वाब थे आँखों में, जो पूरे न हुए थे,
वो ख़्वाब किसी को भी बताते नहीं हैं दोस्त।
जो वक़्त गया, लौट के आता नहीं हर्गिज़,
हम ख़ुद को मगर उसमें सताते नहीं हैं दोस्त।
रिश्तों में अगर प्यार बचा हो तो बचा लें,
हर बात पे रिश्तों को मिटाते नहीं हैं दोस्त।
यादों के दिए आज भी जलते हैं दिलों में,
हम उनको हवाओं से बुझाते नहीं हैं दोस्त।
कल क्या था, उसे सोच के रोते न अनिल हैं,
हम आज को यूँ ख़ाक बनाते नहीं हैं दोस्त।
-पंडित अनिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X