आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हम ख़ुद को मगर उसमें सताते नहीं हैं दोस्त।

                
                                                         
                            आते नहीं हैं दोस्त
                                                                 
                            

गुज़रे हुए दिन लौट के आते नहीं हैं दोस्त,
कुछ ज़ख़्म मगर दिल से मिटाते नहीं हैं दोस्त।

जो लोग कभी साथ में चलते थे हमारे,
अब राह में वो हमको बुलाते नहीं हैं दोस्त।

बीते हुए मौसम की महक याद है दिल में,
वो फूल मगर फिर से खिलाते नहीं हैं दोस्त।

कुछ ख़्वाब थे आँखों में, जो पूरे न हुए थे,
वो ख़्वाब किसी को भी बताते नहीं हैं दोस्त।

जो वक़्त गया, लौट के आता नहीं हर्गिज़,
हम ख़ुद को मगर उसमें सताते नहीं हैं दोस्त।

रिश्तों में अगर प्यार बचा हो तो बचा लें,
हर बात पे रिश्तों को मिटाते नहीं हैं दोस्त।

यादों के दिए आज भी जलते हैं दिलों में,
हम उनको हवाओं से बुझाते नहीं हैं दोस्त।

कल क्या था, उसे सोच के रोते न अनिल हैं,
हम आज को यूँ ख़ाक बनाते नहीं हैं दोस्त।
-पंडित अनिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर