जिनका ह्रदय समंदर सा है
मन अति पावन गंगा सा है
जिनके कठिन परिश्रम से,घर का हर कार्य सँवरता है
इस जगत में सबसे श्रेष्ठ, वही पिता हैं ।
हिमगिरि सा जिनमें स्वाभिमान है
जो शान्त धीर सागर समान है
क्षुधा पिपासा भूल स्वयं की,कुटुंब का पेट जो भरता है
कुल के पालनहार धरा पर, वही पिता हैं ।
वसुधा सा जिनमें क्षमाभाव है
तरुवर जैसा निःस्वार्थभाव है
सूरज सा उजाला देकर के जो, आप स्वयं में तपता है
परिवारीजन के प्राण, सृष्टि में वही पिता हैं।
चट्टानों सी हिम्मत जिनमें है
जज्बातों का जो तूफान लिए है
छोड़ अधूरे अपने सपनें ,वह बच्चों के पूरे करता है
कहते हैं भगवान जिसे सब, वही पिता है।
आसमान सी छाँव है जिसमें
शीतलता है चाँद सी उसमें
अपने दर्द छुपाकर जो,परिवार के सुख में पलता है
भाग्यवान हर शख्स जमीं पर,जिसके माता और पिता हैं ।
- आनंद प्रताप सिंह
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X