वो दिन भी क्या दिन थे
जब मैं और मेरे पिताजी साथ खेला करते थे
मैं रोता था, वो मुझे हँसाया करते थे
मैं गिरता था, वो मुझे उठाया करते थे
कंधे पर बैठाकर मुझको खूब घुमाया करते थे
उँगलियाँ पकड़कर मेरी वो, चलना सिखाया करते थे
मेरी हर जिद को भी वो, हँसकर ही पूरा करते थे
और आज का ये दिन है
जब मैं भी हूँ और पिता जी भी
पर फिर भी उनसे दूर हूँ
वो गिरते हैं मैं उठा नहीं सकता
उनके कंधे का सहारा बन नही सकता
उनकी सेवा आज्ञा पालन में मजबूर हूँ
क्योंकि मैं जीवन की आवश्यकताओं से
बँधी एक डोर हूँ ।
- आनंद प्रताप सिंह
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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