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सवाल जरूरी है

                
                                                         
                            ये भीड़, ये धक्कामुक्की, ये भागम भाग
                                                                 
                            
चारों तरफ की आपाधापी शोर-शराबा
संवेदनाओं को लीलता ये शहर
अनिश्चितताओं के समंदर में डूबते उतरते सपने
दुकानों में बसी आबादी
और रिश्तों में बसी दुकानदारी
गरजते सवालों के झिझके दुबके हुए जबाब
सन्नाटे के लिहाफ में जा छिपता अंतर्द्वंद
क्या मंजिल यही है और है तो क्यों है।

वक़्त
हांथों से फिसलता
दामन छुड़ा कर भागता
ये वक़्त
रौशन उजालों से दूर
किसी अंधेर कोठरी में जा कर छुप गया है
भीड़ से भाग कर '
मानो सन्यास लेना चाहता हो

परम्पराएँ
थोथे परम्पराओं की भीड़ में
हतप्रभ है मेरा मस्तिष्क
शून्य हो गए हैं विचार तर्क
मुखर विरोध एक दिवास्वपन ही रह जाता है
और समझौता कर बैठता हूँ
शायद डरकर ही अग्राह्य आदर्शों से
फिर भी स्वयं को पूरी तरह
जोड़ नहीं पाता इस लिजलिजे व्यवस्था से
और फिर अकेला ही रह जाता हूँ इस भेडचाल में

मृग मरीचिका
चारो तरफ फैला हुआ ये दम घोंटता अँधेरा
उजाले की मौत क्या महज एक दुर्घटना है?
बहरा कर देने वाले शोर के बीच ये चुभता सन्नाटा
थके पांव, झुके कंधे, भावहीन दृष्टि
और सामने मृग मरीचिका
मेरे शतरंज के घोड़े ढाई घर क्यों नहीं चलते?
मेरे तेरे तेरे मेरे मैंने तूने तूने मैंने किसने कब
इस पागल कोलाहल में गुम होते कई सवाल
छूटता जीवन, टूटता तिलिस्म,
बिखरता, बिखराता बहुत कुछ...

कभी खुद को खुद में ही खोता हूं
कभी खुद में ही खुद को पाता हूं
कभी घना कोहरा मेरे ही भीतर
तो कभी मैं कोहरे के ऊपर छाता हूं

वो दूर चमकती सी रौशनी
कभी मुझे इशारे से बुलाती है
कभी मैं उसके पास खुद ही
खींचा सा चल कर जाता हूं

ये जंगल की हरियाली
ये सूखे बंजर रेगिस्तान
ये दूर तक फैले
समंदर का नीला पानी

ये सूरज की दमकती लाली
कभी ये मुझमें तो
कभी मैं खुद को इनमे पाता हूं
मैं ही ये सब
या ये सब ही मैं
इसी कशमकश में
हर बार आता हूं
हर बार जाता हूं

मैं ही हूं मंजिल
या कुछ और ही है मेरी मंजिल
कभी ये सवाल मेरे पास से
तो कभी मैं इस सवाल के पास
से चलकर जाता हूं

ये जाना आना जारी है
पर ये सवाल मेरे हैं
या मैं इन सवालों का
ये नहीं समझ पाता हूं !

मेट्रो में एक सुबह
तुम्हारे ऊपर फौरी नज़र है मेरी
तुम्हारे बदन की हर हरकत पर
तुम्हारे पाँव की हलकी सी जुम्बिश
पर झपट पडूंगा मैं इस्पाती बेंच के उस
हिस्से पर कब्ज़ा करने को
जो अभी तक तुम्हारा था

और मैं नहीं देखूँगा उन हताश बूढ़ी आंखों को
जो इस झपट संस्कृति से अपरिचित
ताकते ही रह गए हैं इस इंतज़ार में
के कब उनकी बारी आएगी

मुझे नहीं देखनी सिलवटों से
भरे वो ललाट, सिले होंठ
और वो मौन वितृष्णा का भाव

वो सांवली औरतें
हमारे पीछे छूटते गाँव की
सकुचाती सी एक कोने में
सिमटी खड़ी रह जाती हैं
मानो कहीं उनकी धक्का मुक्की
से मेरा कोट मैला न हो जाए,

मेरे जूतों की चमक बेअसर रहे
इसलिए शायद उसने वो
गठरी अपने सर पे ली रखी है

कुर्सी हो या बेंच
सारा हिसाब इसका
की कौन पहले झपट पड़ता है
और अभी मैं इस पर काबिज हूँ

पर अब जबकि मैं थोड़ा पसर सा गया हूँ
पैरों को फैला कर, आँखें आधी बंद कर
तो वो कौन है
जो मेरी आँखों में आँखें डाल
सवाल दर सवाल पूछता है?

जबकि मैंने शायद मार ही दिया है
अपने अन्दर के हर द्वंद को
तो वो कौन है
जो मुझे अन्दर ही अन्दर झकझोरता है?

मेरा बेरहम बेशरम मौन
उसके सवालों को खामोश
क्यों नहीं कर पाता?
वो घूरती आँखें किसकी हैं?
सवाल जारी है!

अँधा शहर
कानों में रुई डाल कर; आँखों पे पट्टी बाँध कर
ये अंधी बहरी भीड़ बाज़ार में आती है;
इसे नहीं दिखता
संडास के पास बैठे फटे कपड़ों में बैठे
अधनंगे भूखे बच्चों का हुजूम
दिल्चस्पी नहीं है इसे वो गुलाब खरीदने में
जो मुर्दाघर से उठा कर लायी है जिन्दा बेबस औरतें
ताकि चूल्हे की सांस कमोबेश चलती रहे
मोटर की चिल्ल पों में दब जाती है
मजबूरी बेचने की हर फरियाद
चमचमाती हुई बेरहम गाड़ियां आगे बढ़ जाती हैं
और पीछे ही छूट जाती है भूख, बेबसी और तिलमिलाहट
गुस्से के बवंडर से घिरी ये बहुमंजिली दुकानें, ये ताम झाम
कब तक सह पायेगा यह घृणित विरोधाभास
ये चहकता दमकता हुआ शहर
दहकते दरकते बुनियाद पर
आखिर कब तक खड़ी रह पायेगी
ये नुमाईशी फरमाईशी जिंदगी ; सवाल जारी है

रात जागती है
स्याह लिबास मे सिमटी हुई रात
खुली आँखों से बस करवटें बदलती है

घनघोर सन्नाटे के बीच ये कोलाहल
कुछ तोड़ता कुछ जोड़ता हुआ
मानो कहाँ से आता है

अँधेरे के इस जंगल में रौशनी को किसने इजाजत दी
चीखते सवालों के बेरहम मौन उत्‍तर

दूर कहीं बजते सितार
मानो एक नया आर्तनाद

जब चमकता दमकता हुआ दिन
भरी दोपहरी में चैन की नींद सोता है

तो ये काली अंधेरी रात ना जाने क्यों
कुछ बिखेरती हुई, कुछ समेटती हुई
बस जागती है
रात जागती है।

- अानंद मिश्रा 

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8 वर्ष पहले

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