आपदा में अवसर की तलाश जारी है,
आज हम हैं, कल तुम्हारी बारी है।
वक़्त करेगा हिसाब सभी कर्मों का,
आज हँस लो हम पर—कल तुम्हारी बारी है।
हर बात में वंश-परंपरा खोजते हो क्यों,
क्या वंश पूछने की तुम्हें कोई बीमारी है?
दूसरों के दोष गिनाते रहे बड़े शौक़ से,
अब मौन क्यों हो—जब आई तुम्हारी बारी है?
सत्य को छोड़ असत्य की ओर क्यों बढ़ते हो,
झूठ का शोर बड़ा, पर सच की आवाज़ भारी है।
किसी की विवशता पर आज जो हँसते हो तुम,
याद रखो—समय की अपनी भी बारी है।
अपने सत्कर्मों का इतना बखान न करना,
समय की अदालत में हर कर्म की जवाबदारी है।
‘अनंत’ अपने वैभव पर इतना मत इतराना,
समय के आगे हर शान क्षणिक और उधारी है।
-अनन्त राम त्रिपाठी ‘उमापुष्पांश’
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