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व्यथित मन की चीत्कार है ।

                
                                                         
                            व्यथित मन की ये चीत्कार है
                                                                 
                            
रौद्र रूप धर आत्मा , सृष्टि संहार को तैयार है
हुई सती जैसे पिता घर अप मानित हो कर
उस मातृत्व को को द्धिदकारती व्यथित बाला की
ये आत्मिक पुकार है।।
धरती गगन आकाश पाताल
लुप्त हो अब सब ,शेष न रहे किंचित अवशेष
पाप पुण्य के ढोंग से व्याप्ति जब पूरा संसार है
कथन को विराम दूं , पालन हारी को भी शायद
यही स्वीकार है।।
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एक घंटा पहले

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