मां के गर्भ में भ्रूण रूपी शून्य
से की थी शुरुवात ।
गाजे बाजे के साथ , आरम्भ हुआ
प्रथम चरण ।
माता - पिता का लाड़ दुलार के साथ
सब का मिला प्यार अपरंपार ।
जैसे - जैसे उमर बढ़ी , अपनों की उम्मीद
का भी हुआ विस्तार ।
अपने सपने अपने अरमान
थे विस्तृत फैले गगन समान ।
हर क्षण बढ़ती रही जीवन की कसौटी
पहाड़ जैसी प्रतियोगिताओं में
दब के रह गई खुशियां छोटी - छोटी
जिंदगी होने लगी दुशवार ।
रिश्ते - नाते टूटने लगे
अपनों - पराये के भेद खुलने लगे
समझते - समझाते , समझ आया
ये तो है क्षण भंगुर संसार ।
अंततः शून्य ही सार्थक रहा ।।
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