न धूप देख ना छांव देख, न तपते सूरज का तेज़ देख..
वह ख़ुद को किसके लिए इतना तपा रहा,
हैं जलते उसके भी पाँव बहुत,पर नहीं करता इकरार कभी,
हैं उसकी भी ख़ामोशी में दर्द कई, पर तुमसे काफ़ी कुछ वह छुपा रहा,
हैं उसके भी शौक बहुत,पर दूसरों के वह ख़्वाब सज़ा रहा,
कौन है वह ?जो तुम्हें इतने सपने दिखा रहा,
कौन है वह ?जो बिन कुछ बोले ख़ामोशी से सारे फ़र्ज़ निभा रहा,
वह कोई और नहीं बस वही है,जो शरद रातों में तुम्हें चादर ओढ़ा रहा,
माना की वह है बाहर से सख़्त बहुत,
पर हृदय से तुम्हें गले लगा रहा..
-- अमित कुमार 'गोपाल'
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