तुम्हारे प्रेम में
तुम्हारे प्रेम में
मैंने ख़ुद को खोया नहीं,
बल्कि पहली बार
ख़ुद को पाया है।
तुम्हारी ख़ामोशी में भी
एक आवाज़ सुनाई देती है,
जो मेरे भीतर
धीरे-धीरे घर बनाती है।
तुम्हें चाहना
किसी वादे की तरह नहीं,
बस उस हवा की तरह है
जिसे महसूस तो किया जा सकता है,
मगर बाँधा नहीं जा सकता।
तुम्हारी ख़ुशी में
मेरी ख़ुशी छुपी है,
तुम्हारी मुस्कान में
मेरी हर दुआ बसी है।
और अगर कभी
तुम मेरे साथ न भी रहो,
तो भी तुम्हारा प्रेम
मेरे भीतर यूँ ही रहेगा—
जैसे चाँद के चले जाने के बाद
रात में उसकी रोशनी रह जाती है।
क्योंकि प्रेम तुम्हें पाना नहीं,
तुम्हें ख़ुश देखना है—
और तुम्हारे प्रेम में
मैंने यही सीखा है।
— अमित पाण्डेय
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