ख़त में प्रेम तुम्हारे लिए
लिखना आसान नहीं था...
स्याही तो बहुत थी मेज़ पर,
मगर शब्द
हर बार तुम्हारे नाम पर आकर
ठहर जाते थे।
सोचा, लिख दूँ—
कि तुम्हारी याद आती है,
फिर लगा,
याद तो वो होती है
जिससे कोई दूर हो...
तुम तो
मेरी ख़ामोशी के उस कोने में रहते हो,
जहाँ मैं ख़ुद भी
बहुत कम जाता हूँ।
एक शाम
खिड़की पर धूप कुछ देर बैठी थी,
मैंने उसे भी
तुम्हारा ख़त समझ लिया।
शायद प्रेम यही है—
किसी के आने का इंतज़ार नहीं,
बल्कि उसके बिना आए भी
हर चीज़ में
उसका थोड़ा-सा मिल जाना।
इस ख़त का
कोई जवाब मत देना...
बस कभी
अकेले में इसे पढ़कर
इतना सोच लेना—
कि कहीं कोई है,
जिसने तुम्हें पाने से ज़्यादा
तुम्हें ख़ुश देखने की
दुआ की है।
और हाँ...
अगर कभी
मेरी याद आए,
तो ख़त मत लिखना—
बस खिड़की खोल देना,
हवा में
शायद मेरा प्रेम
अब भी तुम्हारा नाम लेकर
गुज़रता हो।
— अमित पांडेय
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