इश्क़ की राह हो या सज्दों का सफ़र,
दोनों में बस दिल की झुकन चाहिए।
नाम, शोहरत, अदाएँ हैं अपनी जगह,
रब को मिलने को पाक नीयत चाहिए।
इश्क़ हर बार लफ़्ज़ों से कब बयाँ हो,
ख़ामोशी का भी इसमें हुनर चाहिए।
लोग चेहरों से फ़ैसले कर लें चाहे,
दिल पढ़ने को भी एक नज़र चाहिए।
इश्क़ हो या इबादत, बात एक ही है,
दोनों में दिखावा नहीं, समर्पण चाहिए।
— अमित ममगाईं
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