धूप के हिस्से में अक्सर एक ही अंजाम आया,
जिस शजर ने सर न झुकाया, वही सबसे ज़्यादा काम आया।
सारे दरबारों में चेहरे आईनों से डर गए,
जिसने सच कहना भी चाहा, उसके हिस्से इल्ज़ाम आया।
कुछ परिंदे शाख़ बदलकर आसमाँ के हो गए,
एक परिंदा घर बचाता रह गया, नाकाम आया।
लोग मंज़िल बाँटते थे रास्तों की क़ीमतों पर,
हम सफ़र को ओढ़कर निकले, वही असली मुकाम आया।
हमने रोटी कम कमाई, नींद लेकिन बच गई,
उनके घर हर चीज़ पहुँची, बस नहीं आराम आया।
एक क़लम ख़ामोश बैठी थी सभी फ़रमान सुनकर,
जब ज़रा सच लिख दिया, उसके लिए पैग़ाम आया।
'अमित' इस बाज़ार में सब कुछ ख़रीदा जा रहा था,
हम न बिक पाए तो दुनिया को यही इल्ज़ाम आया।
- अमित ममगाईं
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