*ज़मीर के लिए*
ख़ुदा हमारा भी था,
मगर हमने उसे बेच दिया।
कभी रिश्तों के लिए,
कभी किश्तों के लिए।
सच भी झुकता रहा,
बस ज़रूरतों के लिए,
दिल भी टूटता रहा,
झूठी शोहरतों के लिए।
फिर जाना
जो बिक गया दुनिया के लिए,
वो बचा ही कहाँ ख़ुदा के लिए।
अब इरादा है इतना ही
न ज़मीर बिके किसी कीमत के लिए,
न ईमान झुके किसी दौलत के लिए।
क्योंकि जो ख़ुदा को दिल में रखता है,
उसे दुनिया नहीं,
दुनिया का ख़ुदा भी झुका नहीं सकता।
— आचार्य अमित
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