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यादों का साया

                
                                                         
                            मेरी तन्हा ज़िंदगी इतनी भी तन्हा नहीं थी,
                                                                 
                            
जितनी तेरे आने के बाद लगने लगी है।
तेरे आने से पहले ख़ामोशियों में सुकून था,
अब तेरी याद भी एक सज़ा-सी लगने लगी है।

तू बेवजह ही ख़ुद पर इतना गुमान करता रहा,
कितनी सादगी तेरी चाहत में ख़ुद को लुटाती रही।
कितने ख़्वाब तेरे नाम पर अधूरे रह गए,
कितनी उम्मीदें तेरे इंतज़ार में दम तोड़ती रहीं।

तूने किया ये सितम या वक़्त की कोई साज़िश थी,
ये तुझसे बेहतर भला कौन जानता है।
अब क्या कहें तुझसे, क्या शिकायत करें,
जब दिल आज भी तुझे बेगुनाह मानता है।

न कोई शिकवा तुझसे, न कोई गिला है,
जो भी मिला है हमें, बड़े वुसूक़ से मिला है।
कुछ दर्द ने सिखाया, कुछ वक़्त ने समझाया,
हर अपना दिखने वाला शख़्स अपना नहीं होता,
ये सबक़ भी हमें बड़ी क़ीमत देकर मिला है।

न जाने कैसा उन्माद था तेरी मोहब्बत में,
कि ख़ुद को भुलाकर तुझ पर निसार होने लगे थे हम।
तेरे एक लफ़्ज़ को अपनी दुनिया समझ बैठे,
तुझ पर ऐतबार ख़ुद से भी ज़्यादा करने लगे थे हम।

फिर क्या हुआ, क्या ही कहें हम,
जिसे अपना समझा, उसी के लिए तड़पने लगे हम।
जो कभी हमारा था ही नहीं,
उसी के होने की दुआ करने लगे हम।

ऐ ख़ुदा! तेरी रज़ा का ये कैसा फ़साना है?
तू अक्सर उसी का हुआ,
जो हमारा कभी हुआ ही नहीं।
हमने जिसे हर दुआ में माँगा था,
शायद वो हमारे मुक़द्दर में लिखा ही नहीं।

बेअसर रहीं हमारी सारी दुआएँ,
हम ग़मज़दा रहे, वो सदा मुस्कुराए।
हमने हर दर्द को ख़ामोशी से सीने में छुपाया,
और वो हमारी मोहब्बत से बेख़बर अपनी दुनिया सजाते रहे।

बस एक यही ख़्वाहिश थी कि जो चाहा, वो मिल जाए,
जो ख़्वाब देखा, वो हक़ीक़त बन जाए।
हुआ भी वही, मगर कुछ इस तरह हुआ,
जिसे पाने की आरज़ू थी,
उसे खोकर ख़ुद को पाना नसीब हुआ।

अब न मुक़द्दर से शिकायत है, न किसी से कोई सवाल,
कुछ यादें दिल में बाक़ी हैं, कुछ आँखों में मलाल।
जो छूट गया, उसे वक़्त के हवाले कर दिया,
जो टूट गया, उसे तजुर्बा समझकर अपना लिया।

अब समझ आया है कि हर अधूरी चाहत हार नहीं होती,
हर जुदाई ज़िंदगी का अंत नहीं होती।
कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में ठहरने नहीं,
हमें ख़ुद से मिलाने आते हैं।
कुछ दर्द हमें तोड़ने नहीं,
हमारी असली ताक़त से रूबरू कराने आते हैं।

अब अगर तन्हाई फिर मेरे दर पर आएगी,
तो उसे उदासी नहीं, अपना सुकून समझूँगा।
तेरी यादों का साया भले कुछ देर साथ चले,
मैं अपनी ही रूह की धूप में जीना सीख लूँगा।

क्योंकि अब जान लिया है मैंने—

**किसी के न होने से ज़िंदगी अधूरी नहीं होती,
किसी के होने से हर कमी पूरी नहीं होती।
मोहब्बत में ख़ुद को खो देना इश्क़ नहीं,
और ख़ुद को पा लेना कोई हार नहीं होती।**

जो चला गया, उसे दुआओं में रहने देंगे,
जो दर्द मिला, उसे तजुर्बे में ढलने देंगे।
अब किसी की चाहत में ख़ुद को मिटाएँगे नहीं,
अपने ही दिल को फिर किसी से हराएँगे नहीं।

**कभी-कभी ज़िंदगी हमारी दुआ क़ुबूल तो करती है,
बस उसे पूरा करने का तरीक़ा
हमारी सोच से कुछ अलग चुनती है।**

और शायद यही ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत सबक़ है—
हर ख़्वाहिश का पूरा होना ज़रूरी नहीं,
हर अपना हमेशा अपना रहे, ये ज़रूरी नहीं।
कभी-कभी जिसे हम अपनी मंज़िल समझते हैं,
उससे बिछड़ना ही
ख़ुद तक पहुँचने का पहला क़दम होता है।
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
57 मिनट पहले

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