आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विश्व मेरा परिवार

                
                                                         
                            और आपका प्रेम—
                                                                 
                            
मेरे जीवन का वह अमूल्य धन,
जो जितना बाँटता हूँ,
उतना ही बढ़ता जाता है।

"माँ,"
तुम्हारी ममता मेरे अस्तित्व का प्रथम मंत्र है।
तुम्हारी गोद में मैंने
ईश्वर का सबसे कोमल स्पर्श पाया,
जहाँ हर पीड़ा मुस्कान बन जाती है।

"पिता,"
तुम्हारा स्नेह, अनुशासन और त्याग
मेरे जीवन का अटल हिमालय है।
तुमने सिखाया—
झुकना विनम्रता है,
और डटे रहना आत्मसम्मान।

**भाई,**
तुम मेरे साहस की ढाल हो;
जब भी मैं डगमगाया,
तुमने विश्वास का हाथ थाम लिया।

**बहनों,**
तुम्हारा स्नेह जीवन की वह निर्मल सरिता है,
जो हर रिश्ते को पवित्रता से सींचती है।
तुम्हारी दुआएँ
मेरे हर सफ़र की अनकही प्रार्थना हैं।

"जीवनसंगिनी,"
तुम केवल मेरा साथ नहीं,
मेरे अधूरेपन की पूर्णता हो।
तुम्हारे विश्वास ने
मेरे संघर्षों को साधना बनाया,
और तुम्हारे प्रेम ने
घर को मंदिर का स्वरूप दिया।

**मेरे बच्चों,**
तुम मेरे कल का स्वप्न नहीं,
आज की सबसे बड़ी प्रेरणा हो।
तुम्हारी मुस्कान में
मैं भविष्य का उज्ज्वल सूर्योदय देखता हूँ,
और तुम्हारी मासूम आँखों में
ईश्वर की निष्कलुष मुस्कान।

"गुरुवर,"
आपने केवल ज्ञान नहीं दिया,
स्वयं से मिलना सिखाया।
आपने बताया कि
प्रकाश बाहर नहीं,
मन के दीपक में बसता है।
आपके चरणों की धूल
मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।

**परिवार के प्रत्येक सदस्य,**
चाहे दादा-दादी हों,
नाना-नानी का वात्सल्य,
चाचा-चाची, ताऊ-ताई,
मामा-मामी, मौसी-मौसा,
भाभी, देवर, जेठ, ननद,
साला-साली, जीजा-जीजी,
भतीजे-भतीजियाँ, भांजे-भांजियाँ—
हर रिश्ता
ईश्वर की लिखी हुई
एक अनुपम कविता है,
जो जीवन को अर्थ देती है।

**मेरे मित्रों,**
तुम केवल साथी नहीं,
मेरे विश्वास की जड़ें हो।
जब संसार ने प्रश्न पूछे,
तब तुम उत्तर बनकर साथ खड़े रहे।

**मेरे सहयोगियों,**
तुमने कर्म को पूजा बनाना सिखाया।
साथ चलने की शक्ति ही
हर सफलता का वास्तविक आधार है।

**और मेरे बेगानों...**
तुम भी मेरे अपने हो,
बस अभी परिचय अधूरा है।
तुम्हीं ने सिखाया
कि प्रेम की कोई सीमा नहीं होती;
आत्मा न जाति पूछती है,
न भाषा, न धर्म, न पहचान।

अब मेरी आरज़ू केवल इतनी है—
जहाँ दूरी हो,
वहाँ अपनत्व पहुँचा सकूँ;
जहाँ घृणा हो,
वहाँ प्रेम का दीप जला सकूँ;
जहाँ निराशा हो,
वहाँ आशा का सूरज उगा सकूँ;
जहाँ आँसू हों,
वहाँ मुस्कान का कारण बन सकूँ।

मैं ऐसा जीवन जीना चाहता हूँ
कि कोई पराया न रहे,
कोई अकेला न रहे,
कोई उपेक्षित न रहे।

मेरा धर्म—प्रेम हो,
मेरा कर्म—सेवा हो,
मेरी पूजा—करुणा हो,
मेरा मंत्र—विश्वास हो,
और मेरा ध्यान—मानवता हो।

जब "मैं" मिट जाए
और "हम" का प्रकाश
हर हृदय में जगमगाने लगे,
तभी जीवन अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है।

यही मेरी साधना है।
यही मेरा संकल्प है।
यही मेरी प्रार्थना है।

"हर रिश्ते में ईश्वर को देखना,"
"हर हृदय में प्रेम जगाना,"
"हर आत्मा को अपना मानना,"
"और इस सम्पूर्ण सृष्टि को"
"एक ही परिवार के रूप में अपनाना।"

"वसुधैव कुटुम्बकम्"
के इस अमर सत्य को
अपने जीवन का श्वास बना लेना ही
मेरे अस्तित्व का परम उद्देश्य है।
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर