उजालों से मुस्कुराइए…
ख़ुद की ख़ुश-ख़ुमारी से
कभी बाहर भी आइए…
ज़िंदगी सिर्फ़ आईने में
अपनी तस्वीर निहारना नहीं,
कभी किसी और की आँखों में
उम्मीद बनकर भी मुस्कुराइए…
यह दुनिया अँधेरी नहीं है, साहिब,
बस कुछ रास्ते धुंधले ज़रूर हैं…
कहीं किसी दिल में दर्द छुपा है,
तो कहीं किसी आँख में सपने अधूरे हैं।
आप अपने हिस्से का उजाला लेकर चलिए,
किसी बुझते हुए मन में
एक दीप जला दीजिए…
किसी उदास चेहरे को
अपनी मुस्कान दे दीजिए…
यक़ीन मानिए—
जब हम अपने भीतर के सूरज से
दूसरों की राह रोशन करते हैं,
तभी जीवन सच में
ख़ूबसूरत होता है…
तो ख़ुद में ही मत खो जाइए,
ज़रा दुनिया को भी गले लगाइए…
अँधेरों से शिकायत कैसी,
आप ख़ुद उजाला बन जाइए…
और इस दुनिया को
अपने होने की वजह से
थोड़ा और मुस्कुराइए।
— आचार्य अमित
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