आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम याद क्या आये...

                
                                                         
                            तुम याद क्या आए…
                                                                 
                            

कुछ दिन पहले,
उदासी भी उदास थी,
ख़ामोशियों के होंठों पर
कोई गीत नहीं था…
आँखों में नमी थी,
और दिल में
एक अनकहा-सा दर्द था।

फिर न जाने कैसे
तुम याद क्या आए—
जैसे सूनी राहों पर
सवेरा उतर आया,
जैसे किसी बुझते दीपक को
हवा ने फिर से सहलाया।

तुम्हारी याद ने
मेरे भीतर के अँधेरों को छुआ,
और जाने कैसे
हर दर्द को
जीने की वजह मिल गई।

कुछ पल को लगा,
ज़िंदगी ने फिर मुस्कुराकर कहा—
**“अभी कहानी बाकी है…”**

सच तो यही है—
कभी-कभी किसी अपने की
सिर्फ़ एक याद ही काफ़ी होती है,
टूटे हुए मन को
फिर से जोड़ने के लिए…

क्योंकि
तुम याद क्या आए,
उदासी भी मुस्कुरा उठी…
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर