"तुम वही हो..."
हम तुम्हारी
"आँखों से उतरकर,"
धीरे-धीरे
"दिल के घर में रहते हैं।"
तुम्हारी ख़ामोशियों में
अपनी धड़कनों की आवाज़ सुनते हैं,
तुम्हारी मुस्कान में
अपनी दुनिया के उजाले चुनते हैं।
तुमसे मिलना
सिर्फ़ एक मुलाक़ात नहीं,
जैसे किसी अधूरी दुआ का
क़ुबूल हो जाना है।
तुम पास रहो या दूर,
तुम्हारा एहसास
हर साँस में ठहर जाता है—
और फिर दिल ख़ुद से कहता है…
"तुम वही हो,"
जिसे दुनिया
**इश्क़ कहती है…**
और हम वही हैं,
जो तुम्हें पाकर भी
हर पल तुम्हें
"नए सिरे से चाहने लगते हैं।"
-आचार्य अमित
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