रुमानियत वहीं ज़िंदा है
रुमानियत वहीं ज़िंदा है,
जहाँ रूहानियत अभी बाकी है।
सिर्फ़ साँसें चलने का नाम
ज़िंदगी नहीं होता।
ज़िंदगी तो वह है
जो हर दिन कुछ खोती है,
कुछ पाती है।
कभी मरना पड़ता है
अपने अहंकार को,
कभी टूटकर बिखरना पड़ता है
अपने ही सपनों के बीच,
तब जाकर कहीं
जीने का हुनर आता है।
सिर्फ़ रोज़ की उठा-पटक,
भागदौड़ और संघर्ष को
ज़िंदगी नहीं कहते।
ज़िंदगी तो वह एहसास है
जो दर्द में भी मुस्कुराना सिखा दे,
और बिखरकर भी
खुद को फिर से समेट लेना सिखा दे।
समाज के ठेकेदारों को
इतना तो इल्म होना चाहिए
कि जिन झरोखों को
वह बदनाम कर देते हैं,
असल में वही वे दहलीज़ें हैं
जहाँ से जीवन जन्म लेता है,
जहाँ से हर साँस की शुरुआत होती है,
और जहाँ से
एक पूरी दुनिया आबाद होती है।
इसलिए किसी चौखट को
उसकी मजबूरियों से मत आँकिए,
क्योंकि कई बार
इंसानियत वहीं सबसे ज़्यादा ज़िंदा होती है,
जहाँ समाज अपनी नज़रें फेर लेता है।
रुमानियत वहीं ज़िंदा है,
जहाँ रूहानियत अभी बाकी है।
-आचार्य अमित
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