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रुका नहीं हूँ...बस ठहरा हूं...

                
                                                         
                            रुका नहीं हूँ, बस ठहरा हूँ
                                                                 
                            

बहुत दूर है जाना,
बस रुक-सा गया सफ़र है।
कुछ होश में हम हैं,
कुछ गुमशुदा-सा मंज़र है।

थक गए हैं पाँव शायद,
पर हौसलों ने हार कहाँ मानी है।
राहें भले धुंधली हों आज,
मंज़िल ने भी तो मेरी प्रतीक्षा ठानी है।

जब-जब जीवन ने मौन ओढ़ा,
तब-तब आत्मा ने गीत सुनाए।
जो बाहर अँधेरा लगता था,
भीतर उसी ने दीप जलाए।

हर विराम पर एक शिक्षा है,
हर आँसू में ईश्वर का स्पर्श।
जो बिखर रहा है आज भीतर,
वही कल बनेगा जीवन का आदर्श।

समय कभी ठहरता नहीं,
और विश्वास कभी मरता नहीं।
जो स्वयं को पहचान ले,
उसका पथ फिर बिखरता नहीं।

मैं जानता हूँ—
यह रुकावट अंत नहीं,
यह तो नई उड़ान का मौन अभ्यास है।
ईश्वर जब देर करता है,
तो केवल इसलिए कि
वह साधारण नहीं,
असाधारण इतिहास लिख रहा होता है।

इसलिए मुस्कुराकर चलो,
भले कदम आज धीमे हों।
क्योंकि जो आत्मा सत्य के साथ चलती है,
उसके लिए हर ठहराव भी
परमात्मा की ओर बढ़ता
एक पवित्र सफ़र होता है।

— आचार्य अमित
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2 महीने पहले

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