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रस्मों से आगे ज़िंदगी

                
                                                         
                            रस्मों से आगे ज़िंदगी
                                                                 
                            

कुछ रस्में नहीं थीं,
फिर भी हम उन्हें निभाते रहे।

कुछ हादसे ऐसे भी आए,
जो हर पल हमें जीना सिखाते रहे।

दर्द ने गिराया ज़रूर,
मगर हर ठोकर ने हौसलों को नया आकार दिया।
आँसुओं ने आँखें भिगोईं,
पर उन्हीं ने मुस्कुराने का असली अर्थ भी सिखा दिया।

ज़िंदगी की हर कठिन परीक्षा ने
हमें कमज़ोर नहीं, बल्कि और मज़बूत बनाया।
जो खोया, उसने सब्र दिया;
जो पाया, उसने विश्वास जगाया।

आज भी सफ़र जारी है,
क्योंकि मंज़िल से कहीं अधिक
रास्तों ने हमें इंसान बनना सिखाया है।
-आचार्य अमित
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2 महीने पहले

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