"फिर बरस उठे हैं मेघ…"
फिर बरस उठे हैं मेघ,
उसी आषाढ़ की स्मृतियों से भीगे हुए—
जिसके रुदन और क्रंदन में
कभी कोई कालिदास
अपनी मल्लिका को
अश्रुओं का अनंत विधान सौंपकर
अपनी ही आत्मीय अतृप्तता के अधीन
जल बिन मछली-सा तड़पता,
अधूरी अभिलाषाओं का बोझ लिए
बहुत दूर चला गया था।
तब से हर वर्षा
उस विरह की कथा दोहराती है,
हर बूँद में
एक अधूरी प्रतीक्षा की धड़कन सुनाई देती है,
और हर बादल
मानो किसी मौन प्रेम का शोकगीत गाता है।
आज फिर मेघों की गर्जना
मल्लिका के अश्रुविधान का
उदात्त गुणगान कर रही है।
मोतियों-सी झरती वर्षा की हर बूँद
उस अमर प्रेम की साक्षी बनकर
धरती के हृदय पर उतर रही है।
किन्तु विरह
केवल विछोह का नाम नहीं—
वह तो आत्मा का वह तप है
जो प्रेम को अमरत्व प्रदान करता है।
जिस प्रेम में प्रतीक्षा हो,
त्याग हो,
और मौन में भी समर्पण की अनुगूँज हो,
वही काल की सीमाओं से परे
अनन्त हो जाता है।
शायद इसी कारण
हर आषाढ़ में बरसते ये मेघ
हमें स्मरण कराते हैं—
कि अधूरी कहानियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं;
वे बादलों में बस जाती हैं,
बारिश बनकर लौटती हैं,
और हर संवेदनशील हृदय में
प्रेम, धैर्य और आशा का
एक नया दीप जला जाती हैं।
— आचार्य अमित
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