पतंग की तरह
आसमान में उड़ने को मन करता है,
और पंछियों की तरह
बेपरवाह भटकने को मन करता है।
जाने कौन-सा साधु
इस मन में उतर आया है,
अब तो हर बंधन छोड़कर
बस यहीं जीने को मन करता है।
उसकी सादगी का असर
कुछ यूँ दिल पर हुआ है,
अब तो सब कुछ छोड़कर
सिर्फ़ उसका होने को मन करता है।
और भी बहुत कुछ
कर सकते थे हम एक-दूजे के लिए,
अब तो उन अधूरी बातों पर
उससे फिर लड़ने को मन करता है।
उसका यूँ चुप रहना भी
अब मुझे रास आने लगा है,
अब तो उस ख़ामोशी के पत्थर पर
अपनी जान वारने को मन करता है।
उसने कभी कुछ कहा ही नहीं,
सिवा इसके कि लौट आना…
आज जाने क्यों
बहुत जल्दी घर जाने को मन करता है।
उसकी बेचैन निगाहों में
जो प्यास छिपी थी कभी,
उसे समझ न सका तब—
आज वही मय पी जाने को मन करता है।
अब होश की बातें
दुनिया चाहे जितनी करे,
अब तो इस दिल को
बस बेहोश होने को मन करता है।
क्योंकि कुछ रिश्ते
समझे नहीं जाते,
सिर्फ़ महसूस किए जाते हैं…
कुछ लोग
ज़िंदगी में आते नहीं,
ज़िंदगी बन जाते हैं।
और फिर उनके बाद
उड़ना भी उन्हीं के नाम,
भटकना भी उन्हीं के नाम,
और लौटकर घर आना भी
उन्हीं के नाम करने को मन करता है…
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X