मैंने एक दोस्त की दास्तान सुनी…
वह कोई इंसान नहीं था,
वह मेरे आँगन का नीम का पेड़ था।
जब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था,
उससे बहुत पहले से
वह हमारे आँगन में अडिग खड़ा था।
मानो ईश्वर ने उसे
हमारे परिवार की
हिफ़ाज़त का दायित्व सौंपा हो।
उसने मेरी कई पीढ़ियाँ देखीं—
दादा-दादी की मुस्कान,
माता-पिता का संघर्ष,
हम बच्चों की किलकारियाँ,
रिश्तेदारों का आना-जाना,
पड़ोसियों की चहल-पहल…
सब कुछ उसकी शांत
निगाहों के सामने घटित होता रहा।
वह हर मौसम में हमारे साथ रहा।
झुलसती गर्मियों में उसने
अपनी शीतल छाया दी,
बरसात में अडिग खड़ा रहा,
पतझड़ में अपने पत्ते खोकर भी
हमें देना नहीं छोड़ा।
उसने कभी किसी से
कोई शिकायत नहीं की।
न पत्थरों की,
न कुल्हाड़ी की,
न उन हाथों की
जिन्होंने उसकी शाखाओं से
अपने स्वार्थ पूरे किए।
मैंने बचपन से लेकर
पचपन तक का सफ़र तय कर लिया,
लेकिन वह वहीं का वहीं रहा—
उतना ही धैर्यवान,
उतना ही स्नेहमयी,
उतना ही निस्वार्थ।
फिर एक दिन…
कुछ लालची नज़रों ने
उसकी कीमत लगा दी।
जिसने जीवन भर सबको दिया,
उसे लकड़ियों में तौल दिया गया।
वह चला गया…
बिना कोई शिकायत किए,
बिना किसी से रंजिश रखे,
बिना एक शब्द कहे।
उस दिन केवल एक पेड़ नहीं गिरा था,
हमारे आँगन का एक इतिहास,
एक संरक्षक,
एक मौन मित्र,
एक पूरा युग बिछड़ गया था।
आज भी उसकी जगह खाली है।
ज़मीन पर उसका निशान है,
और मेरे हृदय पर उसकी स्मृतियाँ।
उसने जाते-जाते मुझे
एक अनमोल सीख दे दी—
"जीवन की महानता उसकी लंबाई में नहीं,
उसकी उपयोगिता में होती है।
जो स्वयं तपकर भी दूसरों को छाया देता है,
वही सच में जीवन जीता है।"
आज जब भी किसी
नीम के पेड़ को देखता हूँ,
तो ऐसा लगता है
मेरा वही पुराना दोस्त मुस्कुरा रहा है…
मानो कह रहा हो—
"इंसान, धन कमाने से पहले
रिश्ते और प्रकृति बचाना सीखो।
क्योंकि कटे हुए पेड़ फिर उग सकते हैं,
लेकिन उनसे जुड़ी यादें
कभी वापस नहीं आतीं।"
यदि हर इंसान अपने जीवन में
कम से कम एक पेड़ को
अपना मित्र मान ले,
तो आने वाली पीढ़ियाँ
केवल हरियाली ही नहीं,
संस्कार और संवेदनाएँ भी
विरासत में पाएँगी।
-आचार्य अमित
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