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!नहीं चाहिए बचपन मेरा

                
                                                         
                            नहीं चाहिए बचपन मेरा ’ll
                                                                 
                            
कुछ सोच को, कुछ सपनों को मारा है मैंने
हमें ही पता है बचपन कैसे गुजारा है मैने,
दूध का प्याला ,मीठा निवाला इस सब से अनजान था मैं
कुछ जिम्मेदारियों की मार तो कुछ अपनो से परेशान था मैं
जब दर्द बना उफान हो,भूख बना हैवान हो
कुछ सोच को, कुछ सपनों को मारा है मैंने
हमें ही पता है बचपन कैसे गुजारा है मैने,
दूध का प्याला ,मीठा निवाला इस सब से अनजान था मैं
कुछ जिम्मेदारियों की मार तो कुछ अपनो से परेशान था मैं
जब दर्द बना उफान हो,भूख बना हैवान हो
तो जीवन में क्या दिन क्या रात क्या सवेरा,हां नहीं चाहिए बचपन मेरा...!

घर की चार दिवारी में , सुकून छीन सा गया मन की बेकरारी में
ये नशा,तनाव बिगड़ाई में,बचपना मेरा मर सा गया था घर की ही लड़ाई में
बाहरी दुनियां से यूं तो मुझे कोई उम्मीद न था ,
पर घर में भी मै अकेलापन से दूर न था l
ये पिता का प्यार बचपन का संसार किसे प्यारा नहीं होता ,
पर जिसका बचपना मोम की भांति पिघला हो उसे ये बचपन की चाहत दुबारा नहीं होता..!!
 
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59 मिनट पहले

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