मुहब्बत में सियासत
सियासत की बातें
मुहब्बत कहाँ समझती है,
वो तो समझती है सिर्फ़
फ़ायदे का हिसाब,
वक़्त की चाल,
और रिश्तों के बीच
खिंची हुई अदृश्य लकीरें।
गर कुछ समझती है—
तो वो बेवजह का पागलपन,
खोखली मगर गहरी ज़िद,
जीतने की वो हवस
जिसमें अक्सर
दिल हार जाता है।
मुहब्बत में सियासत
अक्सर बाज़ी मार जाती है,
क्योंकि सियासत
दिल नहीं देखती,
सिर्फ़ चाल देखती है।
और फिर—
कभी सियासत की मुहब्बत में,
तो कभी मुहब्बत में सियासत,
अक्सर जीत जाती है...
मगर याद रखना—
जहाँ जीत के बाद भी
दिल ख़ाली रह जाए,
जहाँ रिश्ते बच जाएँ
मगर एहसास मर जाएँ,
वहाँ जीत भी
एक ख़ूबसूरत हार होती है।
मुहब्बत अगर सच्ची हो,
तो उसे सियासत की ज़रूरत नहीं,
और दिल अगर पाक हो,
तो उसे किसी बाज़ी में
जीतने की ख़्वाहिश नहीं।
क्योंकि आख़िर में
सियासत तख़्त जीत सकती है,
मगर मुहब्बत—
दिल जीतती है।
और जो दिल जीत ले,
वही असल में
ज़िंदगी जीत जाता है।
-आचार्य अमित
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