मुहब्बत अमर है...
मुँह फेरकर जो चल दिया,
आज उसकी जुदाई का मातम है।
पर यह केवल एक दिल का दर्द नहीं,
इतिहास भी इस प्रेम का गवाह रहेगा।
मुहब्बत की शिद्दत में
जो उसने अपने अस्तित्व को जिया,
उसकी वह बानगी
हर दौर की दास्तान बनेगी।
यह ज़माना भी कहेगा,
और आने वाला हर ज़माना भी—
कि सच्चा प्रेम कभी हारता नहीं।
ज़िंदाबाद... ज़िंदाबाद...
ऐ मुहब्बत, ज़िंदाबाद!
मुहब्बत ज़िंदा रहती है,
मुहब्बत कभी मिटती नहीं।
वह समय की धूल से नहीं ढकती,
वह तो हर टूटे दिल में
नई रोशनी बनकर जन्म लेती है।
ये उसी के अल्फ़ाज़ थे,
जो आज हमारी आँखों को नम कर गए।
वह स्वयं भले ही
हमारी नज़रों से ओझल हो गया हो,
पर अपनी मुहब्बत को
हमारे दिलों में हमेशा के लिए
बसाकर चला गया।
उसकी याद,
उसका विश्वास,
उसकी मुहब्बत—
हमारे हृदयों में
एक ऐसे चिराग़ की तरह जलती रहेगी,
जिसकी लौ
हर अँधेरे में उम्मीद का रास्ता दिखाएगी।
हर क़दम पर उसकी आवाज़
मानो यही कहती रहेगी—
"प्रेम कभी समाप्त नहीं होता,
वह केवल एक दिल से निकलकर
हज़ारों दिलों में बस जाता है।"
और तब समय स्वयं स्वीकार करेगा—
'संगतराश' का यह दावा
सचमुच क़ाबिले-तारीफ़ ही नहीं,
बल्कि अमर सत्य है।
क्योंकि—
जिस्म मिट जाते हैं,
यादें धुंधली पड़ जाती हैं,
लेकिन सच्ची मुहब्बत
न समय से हारती है,
न मृत्यु से।
वह हर युग में,
हर दिल में,
हर प्रार्थना में
ज़िंदा रहती है।
ज़िंदाबाद...
ऐ मुहब्बत, ज़िंदाबाद! (दिलीप कुमार जी की याद में...)
— आचार्य अमित
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