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कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी

                
                                                         
                            मुहब्बत
                                                                 
                            

अब तुझे चाहना
ज़रूरी हो गया है,
जाने तू कैसे मेरी
मजबूरी हो गया है।

तेरी यादों की बारिश में
भीगता हूँ हर शाम,
तेरा नाम ही जैसे
मेरी ज़िंदगी का पैग़ाम।

तू मिले या न मिले,
ये चाहत कम न होगी,
तेरे बिना भी ये धड़कन
तेरे नाम ही होगी।

कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी
कहाँ दिल में ठहरते हैं,
कुछ अधूरे ख़्वाब ही
उम्र भर साथ चलते हैं।

तू मेरी ख़ुशी है,
तू मेरी तन्हाई भी,
तू ही मेरी दुआ है,
तू ही मेरी रुसवाई भी।

अब तुझे चाहना
सिर्फ़ इश्क़ नहीं रहा,
तू मेरी रूह में उतरकर
मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हो गया।
— आचार्य अमित
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एक महीने पहले

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