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कुछ अनजान से लोग...

                
                                                         
                            "कुछ अनजान से लोग"
                                                                 
                            

जो हदों से परे थे,
वो अब "बेहद हो गए हैं"
कुछ अजनबी से लोग थे कभी,
जो आज मेरी "ज़िंदगी हो गए हैं..."

कहते तो कुछ नहीं,
मगर ख़ामोशियों में उतर जाते हैं,
हम कुछ भी कहें उनसे,
वो बस मुस्कुराकर
"दिल में उतरते जाते हैं।"

न कोई वादा था,
न कोई रिश्ता नाम का,
फिर भी जाने कैसे
हिस्सा बन गए
मेरी हर एक शाम का।

कुछ रिश्ते शब्दों के मोहताज नहीं होते,
कुछ एहसास कभी राज़ नहीं होते,
जो मिल जाएँ रूह से रूह की तरह,
वो लोग फिर कभी
"अजनबी नहीं होते।"

उनकी मौजूदगी में
हर दर्द भी सुकून बन जाता है,
उनकी एक मुस्कान से
टूटा हुआ मन
फिर से जीना सीख जाता है।

कुछ लोग मिलते हैं
सिर्फ़ राहों में नहीं,
वो मिलते हैं "किस्मत की दुआओं में"
और फिर यूँ समा जाते हैं
हमारी साँसों में,
कि उनका ज़िक्र भी
"इबादत सा लगने लगता है।"

इसी तरह के रिश्ते
अब मेरी रूह में खो गए हैं,
कुछ अनजान से लोग थे कभी,
जो मेरी "ज़िंदगी हो गए हैं।"

और शायद रिश्तों की खूबसूरती यही है
हर रिश्ता नाम से नहीं,
"निभाने से अपना होता है…"
कुछ लोग करीब होकर भी दूर रहते हैं,
और कुछ दूर होकर भी
"हमारी धड़कनों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।"
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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