ख़ुदा, फ़ितरत और दौलत
मनचाहे अँधेरों को गर हर पल रोशनी मिल जाती,
तो कौन समझता फिर ख़ुदा की कुदरत को?
हर दुआ अगर उसी पल मुकम्मल हो जाती,
तो कौन पहचान पाता फिर इंसान की फ़ितरत को?
कुछ ख़्वाहिशें अधूरी रहीं तो सब्र का अर्थ समझ आया,
कुछ रास्तों ने ठोकर दी तो चलना हमें आया।
कुछ अपने बिछड़ गए तो रिश्तों की कीमत जानी,
कुछ ख़्वाब टूटे तो ख़ुद से मिलने की कहानी जानी।
दौलत से महरूम हुए जो लोग इस जहाँ में,
वो ख़ुदा के रहमो करम पर टिक गए।
हर आँसू को दुआ बनाया,
हर ज़ख़्म को सजदा किया,
और हर कमी में—
किसी ने अपने रब को पा लिया।
और जो खुशनसीब थे या ख़ुद को खुशनसीब समझते थे,
जिनके हाथों में दुनिया की सारी चमक थी,
वो उसी नामुराद दौलत के हाथों बिक गए—
जिसे पाने के लिए उन्होंने
सुकून, रिश्ते, ज़मीर और ख़ुद को तक बेच दिया।
अजीब है ये दुनिया भी...
जिसे हम अपनी क़िस्मत की कमी समझकर रोते हैं,
कभी कभी वही कमी
हमें ख़ुदा के सबसे क़रीब ले जाती है।
और जिसे हम अपनी कामयाबी समझकर इतराते हैं,
कभी कभी वही कामयाबी
हमें अपने ही भीतर से दूर कर जाती है।
शायद इसलिए—
हर अधूरी दुआ बदक़िस्मती नहीं होती,
हर ठोकर हार नहीं होती,
हर कमी अभिशाप नहीं होती।
कुछ कमियाँ हमें विनम्र बनाने आती हैं,
कुछ ठोकरें हमें मज़बूत करने,
और कुछ अधूरे ख़्वाब
हमें उस मुकाम तक पहुँचाने,
जहाँ इंसान दुनिया नहीं,
अपने ख़ुदा को तलाश करता है।
क्योंकि आख़िर में—
दौलत हाथ में रह जाए या न रह जाए,
नाम दुनिया याद रखे या भूल जाए—
अगर ज़मीर ज़िंदा है,
दिल में इंसानियत बाक़ी है,
और रूह में ख़ुदा का उजाला है,
तो समझो...
ज़िंदगी ने तुम्हें सब कुछ दे दिया।
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X