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क़रीब होकर भी दूर है

                
                                                         
                            क़रीब होकर भी दूर है
                                                                 
                            

तुम अकेले नहीं हो,
जिसने छल किया है मुझे—
मेरे अपने भी बहुत हैं,
जो मेरे क़रीब होकर
मुझसे ही दूर रहे...

कुछ चेहरे अपने थे,
मगर उनके दिल में
मेरे लिए कोई जगह न थी,
कुछ रिश्ते नाम के थे,
जिनमें अपनापन तो था,
पर सच्चाई नहीं थी।

मैंने हर बार
रिश्तों को दिल से निभाया,
और हर बार
किसी न किसी ने
मुझे भीतर से तोड़ दिया।

मगर अब शिकायत नहीं—
क्योंकि हर छल ने
मुझे थोड़ा और समझदार,
हर दर्द ने
मुझे थोड़ा और मज़बूत किया है।

अब जो दूर हैं,
उन्हें दूर ही रहने दूँगा,
और जो सच में अपने हैं,
उनके लिए
अपने दिल के दरवाज़े
हमेशा खुले रखूँगा।

क्योंकि रिश्तों की भीड़ नहीं,
**रिश्तों की सच्चाई मायने रखती है।**

और हाँ—
तुम अकेले नहीं हो,
जिसने मुझे छलने की कोशिश की है…
मेरे अपने बहुत हैं,
जो क़रीब होकर भी
तुमसे कहीं ज़्यादा
मुझसे दूर हैं।
-आचार्य अमित
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3 hours ago

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