"इश्क़ का तकिया, रूह का सफ़र"
इश्क़ जब भी लौटकर आता है,
मुझे केवल सताने नहीं आता—
वह मेरी रूह के बंद दरवाज़ों पर
धीमे से दस्तक देता है।
यादों के बिस्तर पर
अश्कों का तकिया रख देता है,
ताकि मैं रोते-रोते
अपने भीतर सोई हुई चेतना को जगा सकूँ।
हर आँसू
एक प्रार्थना बन जाता है,
हर पीड़ा
ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ी बन जाती है।
तब समझ आता है—
सच्चा इश्क़ किसी को पाने का नाम नहीं,
स्वयं को खोकर
परमात्मा में समा जाने का मार्ग है।
जो दर्द आज हृदय को चीरता है,
वही कल आत्मा का उजाला बनकर
जीवन को नई दिशा देगा।
इसलिए अब
मैं इश्क़ से शिकायत नहीं करता,
क्योंकि वही मुझे
अहंकार से मुक्त कर
प्रेम के उस अनंत आकाश तक ले जाता है,
जहाँ न विरह शेष रहता है,
न अश्रु, न अकेलापन—
बस एक मौन,
एक प्रकाश,
और ईश्वर का असीम आलिंगन।
आचार्य अमित
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