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एक तू ही इब्तिदा, एक तू ही पहचान

                
                                                         
                            एक तू ही इब्तिदा, एक तू ही पहचान
                                                                 
                            

कुछ अल्फ़ाज़ दिल में उतरते हैं,
कुछ आँखों में ठहर जाते हैं…
और कुछ जज़्बात ऐसे होते हैं,
जिन्हें कहने की कोशिश भी
दिल को ख़ामोश कर जाती है।

कुछ कहना मुश्किल है मगर,
कुछ कह देना भी कहाँ आसान रहा…
आदतें परवाज़ भरती रहीं मेरी,
पर हर उड़ान के आसमान में
तेरा ही एक निशान रहा।

तेरा ज़िक्र मेरी साँसों में,
तेरा फ़िक्र मेरी रूह में…
तू दूर होकर भी पास रहा,
जैसे कोई दुआ
चुपचाप रहती है दिल की धड़कनों में।

तू शान है, तू आन है मेरी,
तू ही मेरी पहचान है…
मेरी हर ठोकर में सबक तू,
मेरी हर जीत में मुस्कान है।

जब दुनिया ने मुझे समझना चाहा,
मैं ख़ुद से ही अनजान था…
तूने मेरी ख़ामोशी पढ़ ली,
शायद इसलिए आज
मैं अपने ही भीतर मेहमान नहीं—
एक मुकम्मल इंसान हूँ।

मेरी राहों में चाहे
कितने ही अँधेरे क्यों न आएँ,
मेरी रूह में उम्मीद का
एक दीपक जलता रहेगा…
क्योंकि जहाँ विश्वास ज़िंदा हो,
वहाँ सफ़र कभी ख़त्म नहीं होता।

मैं गिरूँगा भी, सँभलूँगा भी,
चलूँगा फिर उसी जुनून के साथ…
क्योंकि मंज़िल से भी प्यारा है
उस परम शक्ति पर विश्वास,
जो हर पल कहती है—
“तू चलता रह…
मैं तेरे साथ हूँ।”

तू ही इब्तिदा है मेरी,
तू ही मेरी पहचान…
तेरे नाम से शुरू हर ख़्वाब,
तेरे विश्वास पर क़ुर्बान।
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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