दो अधूरी-सी ज़िंदगियाँ थीं,
दो किनारों की तरह,
जो चाहकर भी मिल न सकीं,
इस विस्तृत संसार में…
उम्र भर निहारती रहीं
एक-दूजे के साये को,
मगर छू न सकीं कभी
एक-दूजे के एहसास को,
न हाथों की गर्माहट मिली,
न साथ का सुकून,
बस दिल में पलता रहा
एक अनकहा-सा जुनून…
वक़्त गुज़रता रहा,
फ़ासले बढ़ते रहे,
लब ख़ामोश रहे,
मगर दिल कुछ कहते रहे…
अब अक़ीदा उनका
और भी मज़बूत हो रहा है,
लोग कहते हैं वहाँ
एक नया पुल बन रहा है…
कहते हैं, उस पुल की नींव में
कुछ नया रंग आएगा,
एक नया दौर,
एक नई सुबह,
एक नया ख़्वाब सजाएगा…
मगर डर है कि इस
नयेपन की दौड़ में,
जो पुराना है भीतर,
जो सदियों से धड़कता आया है,
वो कहीं खो न जाएगा…
क्योंकि हर नया पुल
सिर्फ़ रास्ते नहीं बनाता,
कभी-कभी वो पुराने
किनारों का दर्द भी
और गहरा कर जाता है…
सादे बंदे क्या जानें
दुनिया के ये धंधे,
यहाँ जज़्बात भी बिकते हैं,
रिश्ते भी बिकते हैं,
और कभी-कभी इंसान भी
बिक जाते हैं एक-दूसरे के भाव में…
अब क्या बचा है बाक़ी
उनके अधूरे गाँव में?
न कोई किलकारी गूँजती है,
न कोई उमंग है छाँव में…
आँगन सूने पड़े हैं,
चौखटें उदास हैं,
जिन आँखों में ख़्वाब थे कभी,
आज बस उनकी प्यास है…
कब की कट चुकी है डोर,
उड़ चुकी है दिल की पतंग,
आसमान भी ख़ामोश है,
और ख़ामोश है हर उमंग…
फिर भी दिल कहता है
"काश! मिल जाएँ वो कहीं,
ख़्वाबों की दुनिया से परे,
जहाँ न कोई सरहद हो,
न कोई फ़ासला दरमियाँ रहे…"
जहाँ न कोई सौदा हो,
न कोई शर्त-ए-वफ़ा,
बस आँखें आँखों से
कह दें वो सब,
जो कह न सके ज़ुबाँ…
जहाँ मोहब्बत को
किसी नाम की ज़रूरत न हो,
जहाँ मिलने के लिए
किसी पुल की ज़रूरत न हो…
क्योंकि प्रीत की धुन अनमोल है,
इसका कोई मोल नहीं,
ये वो इबादत है दोस्तों,
जिसका कोई तोड़ नहीं…
ये रूह से उठती है,
रूह में उतर जाती है,
दुनिया चाहे लाख बदल जाए,
मोहब्बत कहाँ मर पाती है…
अब किसका शुक्रिया अदा करूँ,
ये बता दो ऐ दोस्तों,
किसके सजदे में झुकाऊँ सिर,
किसको दुआ दूँ ऐ दोस्तों…
सबने चाहा है हमें,
किसी ने दुआओं में,
किसी ने अपनी यादों में,
किसी ने अधूरी कहानियों में…
तो फिर हम भी चाहेंगे उन्हें,
बिना किसी शिकायत के,
बिना किसी शिकवे के,
बिना किसी उम्मीद के,
बिना किसी शर्त के…
चाहेंगे उन्हें उनकी
ख़ुशी की ख़ातिर,
उनकी हँसी की ख़ातिर,
उनके सुकून की ख़ातिर…
भले ही हमारी राहें
कभी एक न हो पाएँ,
भले ही हमारे हिस्से में
मिलन के पल न आएँ…
मगर हमारी मोहब्बत
किसी मंज़िल की मोहताज नहीं,
जो दिल में बस जाए,
वो दूरी की भी मोहताज नहीं…
"क्योंकि प्रेम पाना ही नहीं,
प्रेम निभाना भी है, किसी को
अपना कहना ही नहीं,
उसकी ख़ुशी में मुस्कुराना भी है…"
और अगर यही इश्क़ है,
तो हमें ये इश्क़ मंज़ूर है,
अधूरा सही,
मगर दिल से भरपूर है…
सबने चाहा है हमें,
हम भी चाहेंगे उन्हें…
इस जन्म में न सही,
किसी दुआ के असर में,
किसी ख़्वाब के सफ़र में,
किसी अनजानी सुबह में…
"हम भी चाहेंगे उन्हें…"
हाँ, हम भी चाहेंगे उन्हें…
न पाने की ज़िद में,
न खोने के डर में,
बस एक पाक-सी मोहब्बत बनकर,
अपने दिल के भीतर…
"हम भी चाहेंगे उन्हें…
हम भी चाहेंगे उन्हें…"
-आचार्य अमित
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