हृदय के तार
क्यों छेड़ते हो
ये तार दिल के,
जब जानते हो—
तुम्हारे स्पर्श भर से
ये तार-तार हो जाएँगे...
ये हृदय कोई वाद्य नहीं,
जिसे मनचाहा सुर दे सको;
यह तो वह मंदिर है,
जहाँ हर स्पंदन में
किसी अदृश्य ईश्वर की
आहट सुनाई देती है।
छूना ही है तो
मेरी आत्मा को छूना,
मेरे मौन को सुनना,
मेरी आँखों में उतरकर
वह सत्य पढ़ना
जो शब्दों में कभी कहा नहीं गया।
क्योंकि प्रेम
केवल पाने का नाम नहीं,
प्रेम तो वह साधना है
जहाँ स्वयं को मिटाकर
किसी और में
ईश्वर का अंश दिखाई देने लगे।
मेरे दिल के तार
मत छेड़ो यूँ ही—
इनमें सांसारिक धुन नहीं,
एक अधूरी प्रार्थना बसी है...
और यदि छूना ही है,
तो इतनी श्रद्धा से छूना
कि टूटकर भी
मैं बिखरूँ नहीं—
बल्कि तुम्हारे स्पर्श से
और अधिक पूर्ण हो जाऊँ।
-आचार्य अमित
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