चिंगारी
बुझे हुए हौसलों को
फिर से रोशनी दे दो,
इस प्यासे मन को
समंदर की तिश्नगी दे दो।
जो जल न सका,
और बुझकर चुप हो गया,
उस राख में छिपी
एक चिंगारी जगा दो।
ये दिल है बाखुदा,
कोई पत्थर तो नहीं;
बस वक़्त की आँच में
कोयला-सा हो गया है।
कोयले को भी
शिकायत नहीं होती,
वो ख़ामोशी से तपता है,
तभी हीरा बनता है।
मेरी राहों में
काँटे ही काँटे सही,
मगर मेरे क़दमों को
रुकना नहीं आता।
अँधेरा चाहे
कितना भी गहरा हो,
एक छोटा-सा दिया
उससे डरता नहीं।
हार अगर
दरवाज़ा बंद करती है,
उम्मीद वहीं एक खिड़की खोल देती है।
ऐ ज़िंदगी,
मुझे आसानियाँ नहीं, बस इतना कर— मेरे यक़ीन को कमज़ोर मत होने देना।
क्योंकि
जो भीतर से जलता है,
वही बाहर उजाला करता है।
-आचार्य अमित
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