आँखों से दिल तक
कितना बंद करूँ दरवाज़ा दिल का,
वो तो आँखों से उतरता है दिल में।
ना आहट देता है, ना दस्तक,
बस ख़ामोशियों का हाथ थामे
अपना एहसास छोड़ जाता है।
मैं लाख पहरे बिठा लूँ जज़्बातों पर,
वो हर बार मुस्कान का बहाना बन जाता है।
नज़रों की एक मुलाक़ात ही काफ़ी है,
वो हर दूरी को अपना फ़ासला मानने से इंकार कर देता है।
कुछ रिश्ते इज़हार के मोहताज नहीं होते,
वो ख़ामोशी की ज़ुबान भी पढ़ लेते हैं।
जहाँ विश्वास साँस लेता है,
वहाँ प्रेम अपना घर बना लेता है।
दिल के दरवाज़े बंद किए जा सकते हैं,
मगर रूह की खिड़कियाँ कौन बंद करेगा?
जब मोहब्बत सच्ची हो,
तो वह आँखों से उतरकर
सिर्फ़ दिल में नहीं,
पूरे अस्तित्व में बस जाती है।
-आचार्य अमित
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