रुकने की आदत नहीं है,
इसलिए थका हूँ, मगर हारा नहीं,
रास्ते कठिन थे, मंज़िल दूर थी,
फिर भी मैंने ख़ुद को पुकारा सही।
आगे बढ़ता रहा हर बार,
चाहे कदमों ने साथ दिया या नहीं,\
दुनिया से जीतने की चाह नहीं थी,
बस ख़ुद से हारना मंज़ूर नहीं।
दुख बस इतना रहा उम्र भर,
कि अपने सिवा किसी से लड़ा नहीं,
जिसे हराना था, वह भीतर था,
और जिसे जीतना था
वह भी कोई और नहीं, मैं ही था।
अब समझ आया
संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं,
सबसे गहरा युद्ध तो
अपने ही भय, अहं और भ्रम से है।
जो गिरकर भी उठता रहा,
जो टूटकर भी मुस्कुराता रहा,
जिसने अँधेरों में भी
अपने भीतर का दीप जलाए रखा
वही सच में आगे बढ़ता रहा।
अब न शिकायत है,
न किसी से कोई गिला,
बस एक संकल्प है
कल से बेहतर बनूँ आज,
और आज से बेहतर
अपना कल लिखूँ।
क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी जीत
किसी और को हराने में नहीं,
बल्कि हर दिन
अपने ही कल से आगे निकल जाने में है।
-आचार्य अमित
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