ना जाने क्यु आसमान की ठहरी वो
एक पल के लिए ज़मीं पर उतर आई?
वक्त के पहिए ने कैसी यह चाल है चलाई!
किस बात की बेरुखी थी उसकी,
आज तक समझ में नहीं आई।
उसके जाने के बाद वह याद बहुत आई,
टूटने की भले सदा सी नहीं आई,
अब पता चला, क्या होती हैं रस्में जुदाई।
क्यों भूल गई वह खुदा की यह खुदाई?
नदी सी चंचलता तो दिखी,पर न दिखी उसे सागर की गहराई।
खामोशियों से भी एक सदा सी है आई,
सच कहते हैं, दिल अपना और प्रीत पराई?
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