काँच की है चार दीवारी, मिलता दाना-पानी,
कैसे इस दायरे में फँस गई, सुंदर जल की रानी!
आँखें तुम्हारी इतनी सुंदर, तन पर जल की धारा,
मुँह से बुलबुला ऐसे छूटे जल मे उड़ता गुब्बारा।
जल ही जल में जीवन है, तुमसे ही दुनिया जानी,
कैसे इस दायरे में फँस गई, सुंदर जल की रानी!
कैसे इस छोटे शीशमहल में,खुद को हो बहलाए?
पत्थर क्या कुछ रंग-बिरंगे,पौधे तुमने लगाए?
छोटी सी इस दुनिया में क्या बीत रही जिंदगानी,
कैसे इस दायरे में फँस गई, सुंदर जल की रानी!
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