फल भी लगते घर भी बनते
आती उनपे हरी जवानी
स्वार्थ का दिमक लगा जबसे
खत्म हो रहा रिश्तो मे पानी
सुख चुके रिश्तो के पेड
मर्यादा का अब रहा ना मेड
देख दुनिया के बदलते रिश्ते
इन्सान बन रहे है भेड
स्वार्थ का परीणाम पतन,त्याग एक उत्थान है
कपटहीन निश्छल ह्रदय,भगवान का स्थान है
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