भक्ती भाव जागे आते तेरी स्मृति माँ
ये हरे-भरे पेड़, वायु तुझसे, प्रकृति, माँ,
हर फूल-हर जगह तेरी ही कृति है, माँ।
अद्भुत तेरी सुकृति है, माँ,
तुझसे ही बनती हर आकृति है, माँ।
जीवन्त होती अनुकृति है, माँ,
हर बात में होती तेरी स्वीकृति है, माँ,
तब जाकर विद्या कला में जागी ऐसी प्रीति है, माँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X