लोग सभी सोए हैं
अपने-अपने सपनों में खोए हैं
कमबख्त मेरी ही नींद किस्तों में भी बँटती नहीं
बड़ी लंबी है रात, कटती नहीं
घड़ी की सुइयों की आवाज़ चुभती है
साँसें रह-रह के अब उबती हैं
छलावा है ये टक-टक, अंतिम पहर घटती नहीं
बड़ी लंबी है रात, कटती नहीं
दरवाज़े के नीचे रोशनी की आहट
नहीं जब तक आती, होती है घबराहट
एक पल पलकें ये दोनों आपस में सटती नहीं हैं
बड़ी लंबी है रात,कटती नहीं
पता नहीं कब उषा की किरण आएगी
आँखें ये लालिमा की आहट पाएंगी
सुबह के इंतज़ार से बेकरार ये आँखें हटती नहीं
बड़ी लंबी है रात, कटती नहीं।
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